न तस्य प्रतिमा अस्ति

न तस्य प्रतिमा अस्ति
इस मन्त्र को लेकर आर्य समाज पर आक्षेप किया जाता है कि आर्य समाज इसका अर्थ ईश्वर की प्रतिमा नही है गलत करता है जबकि यहा उपमा नही है ऐसा लिखा है|
लेकिन हम यहा पोराणिक मान्य वेद भाष्यकारो के भाष्य से ही दिखाते है जिन्होंने भी प्रतिमा का अर्थ परिमाण ,प्रतिबिम्ब ,मूर्ति ही माना है
उव्वट भाष्य – न तस्य पुरुषस्य प्रतिमा प्रतिमानभूत किंचिद्विद्यते |”
अर्थात – उस पुरुष परमात्मा की प्रतिमा ओर प्रतिमा जेसी कोई वस्तु नही है |
यहा प्रतिमा का अर्थ प्रतिमा (मूर्ति आदि) ही लिया है तुलना ,उपमा नही |
महीधर भाष्य – तस्य पुरुषस्य प्रतिमानमुपमान किंचद्व्यस्तु नास्ति |”
उस परमेश्वर की प्रतिमान ,उपमान कोई वस्तु नही है |
यहा प्रतिमा शब्द का मूर्ति .चित्र माप में ही प्रयोग किया है |
प्रतिमान शब्द प्रतिमा (मूर्ति ,नाप ,प्रतिकृति ,छाया चित्र का पर्याय ही है )
देखे अमरकोश २/१०/३५-३६
प्रतिमान प्रतिबिम्ब प्रतिमा प्रतियातना प्रतिछाया |
प्रतिकृतिरचा पुंसि प्रतिनिधिरुपमोपमान स्यात ||
प्रतिमान ,प्रतिबिम्ब ,प्रतिमा ,प्रतियातना ,प्रतिछाया ,प्रतिकृति ,अर्चा ,प्रतिनिधि –ये आठ नाम प्रतिमा के है |
अत: आर्यसमाजी या दयानंद जी प्रतिमा का अर्थ मूर्ति या तौल ,नाप करते है वो बिलकुल सही है ओर इसका समर्थन पोराणिक मान्य भाष्यकार ओर अमरकोश भी करता है |
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न तस्य प्रतिमा यजुर्वेद ३२।३
“ ईश्वर निराकार है “—–
उसकी को प्रतिमा या मूर्ति नही हो सकती
“”” यजुर्वेद “””
न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद यशः ।
हिरण्यगर्भ इत्येष मा मा हिन्सीदत्येषा यस्मात्र जात इत्येष ॥ यजु॰ ३२।३
भावार्थ – हे मनुष्यो ! ( यस्य ) जिसका ( महत ) पूज्य बडा ( यशः ) कीर्ति करनेहारा धर्मयुक्त कर्म का आचरण ही ( नाम ) नामस्मरण है , जो ( हिरण्यगर्भः ) सूर्य बिजुली आदि पदार्थो का आधार ( इति ) इस प्रकार ( एषः ) अन्तर्यामी होने से प्रत्यक्ष जिसकी ( मा ) मुझको ( मा, हिंसत ) मत ताड्ना दे वा वह अपने से मुझ को विमुख मत करे, ( इति ) इस प्रकार ( एषा ) यह प्रार्थना वा बुद्धि और ( यस्मात ) जिस कारण ( न ) नही ( जातः ) उत्पन्न हुआ ( इति ) इस प्रकार ( एषः ) यह परमात्मा उपासना के योग्य है । ( तस्य ) उस परमेश्वर की ( प्रतिमा ) प्रतिमा – परिणाम उसके तुल्य अवधि का साधन का साधन प्रतिकृति , मूर्ति वा आकृति व प्रतिबिम्ब ( न , अस्ति ) नही है ।
भावार्थ —— हे मनुष्यो ! जो कभी देहधारी नहीं होता , जिसका कुछ भी परिमाण सीमा का कारण ( ‘कारण’ अर्थात जिसके होने से कार्य होता है ) नही है , जिसकी आज्ञा का पालन ही उसका नामस्मरण करना है, जो उपासना किया हुआ अर्थात जिसकी सब उपासना करते है, अपने उपासकों पर अनुग्रह ( कृपा ) करता है. वेदों के अनेक स्थलों में जिसका महत्व कहा गया है, जो नहीं मरता , न विकृत होता है ,न नष्ट होता उसी की उपासना निरन्तर करो । जो इससे भिन्न की उपासना तो करोगे तो इस महान पाप से युक्त हुए आप लोग दुःख – क्लेशों से नष्ट हो जाओगे ॥ ३ ॥

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