अहिंसा की लाठी और स्वामी श्रद्धानंद

Madhu Dhama

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अहिंसा की लाठी और स्वामी श्रद्धानंद
By Farhana Taj
स्वामी श्रद्धानंद ने शुद्धि आंदोलन चलाया तो कथाकार प्रेमचंद जो बाद में गोदान के लेखक बने, उन्होंने सलाह दी, ‘गुरुवर शुद्धि आंदोलन तो चलाना ठीक है, लेकिन ढोल नगाडों के साथ स्वागत करना अच्छी बात नहीं। यह कार्य गुपचुप तरीके से होना चाहिए।’
‘नहीं धर्म का कार्य ढोल बजाकर ही होना चाहिए।’
‘परंतु इसमें अडचन है?’
‘क्या अडचन है।’
‘गांधी!’
‘वह कैसे?’
‘जल्द पता चल जाएगा।’
और जब गांधी जी को शुद्धि आंदोलन का पता चला तो उन्होंने संत बिनोवा भावे से बात की और उन्हें कहा, ‘अहिष्णुता फैलाने वाले उस संत को रोको और यदि वे न रूकें अहिंसा की लाठी का प्रहार करो।’
बिनोवा भागे-भागे मलकाने में गए और जब स्वामी जी नहीं रूके तो उन्होंने अहिंसा की लाठी का इस्तेमाल किया और भूख हडताल तब तक रखी, जब तक वे लोग पुनः गोमांसभक्षी न बन गए।
पुस्तक आदर्श समाज सुधारक, लेखक भक्त रामशरणदास, पिलखुवा वाले….प्रकाशक गीताप्रेस गोरखपुर…भूमिका हनुमान प्रसाद पोद्दार, संस्करण 1955
Madhu Dhama’s photo.

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