The word Brahman

Dinesh Sharma

ब्राह्मण शब्द की व्याकरण से व्युत्पति

ब्राह्मण शब्द की व्युत्पत्ति से पहले महाभाष्यकार महर्षि पतंजलि जी के अनुसार आइये विचार करते हैं जाति किसे कहते हैं। ? महर्षि पतंजलि पशपाशाह्निक में लिखते हैं कि — ” तद्भिन्नेष्वभिन्नं छिन्नेष्वछिन्नं सामान्यभूतं (यत् ) आकृति: नाम सा ” अन्वय – यत् भिन्नेषु अभिन्नं छिन्नेषु अच्छिन्नं तत् सामन्याभूतं , सा आकृतिः नाम। अर्थात जो विभिन्नों में अभिन्न हो , छेदन करने पर भी अच्छिन्न हो वह सामान्यभूत = सामान्य स्वरूप अर्थात वह सामान्य आकृति अर्थात जाति है। यहां महर्षि पतंजलि जी सामान्य को जाति कहते हैं। और इसी प्रकार महर्षि कणाद वैशेषिक दर्शन में कहते हैं कि — ” धर्मविशेषप्रसूताद् द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायानां पदार्थानां साधर्म्यवैधर्म्याभ्यां तत्वज्ञानात् निःश्रेयसम्।( वैशेषिक , 1 /1 /4 ) ” अर्थात द्रव्य, गुण,कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय इन छः पदार्थों के साधर्म्य और वैधर्म्य के द्वारा धर्मविशेष से उत्त्पन्न तत्व ज्ञान से निःश्रेयस की प्राप्ति होती है। यहां महर्षि कणाद कह रहे हैं कि – पदार्थ छह प्रकार के होते हैं। 1 – द्रव्य ,2 – गुण, 3 – कर्म ,4 – सामान्य ,5 – विशेष ,6 – समवाय। यहां महर्षि कणाद भी महर्षि पतंजलि जी की तरह सामान्य को जाति कहते हैं और जाति के सम्बन्ध में महर्षि कणाद कहते हैं — ” सामान्यं विशेष इति बुध्यपेक्षम्। ” ( वैशेषिक , 1 /2 /3 ) अर्थात सामान्य और विशेष बुद्धि की अपेक्षा से सिद्ध होते हैं। जैसे मनुष्य व्यक्तियों में मनुष्यत्व सामान्य और पशुत्वादि से मनुष्यत्व विशेष अर्थात मनुष्यत्व सामान्य भी है और अन्य की अपेक्षा से विशेष भी है। इसी तरह स्त्री व्यक्तियों में स्त्रीत्व सामान्य है और पुरुषत्व से स्त्रीत्व विशेष है, पुरुष व्यक्तियों में पुरुषत्व सामान्य है और अन्य की अपेक्षा से विशेष है। ब्राह्मण में ब्राह्मणत्व , क्षत्रिय में क्षत्रियत्व, वैश्य में वैश्यत्व ,शूद्र में शूद्रत्व सामान्य है और एक दूसरे की अपेक्षा विशेष है।

ब्रह्म = वेदम् अधीते= पठति , वेद= जानाति वा इति ब्राह्मणः। ब्रह्मणः अपत्यम् ब्राह्मणः। यहां ” तद् अधीते तद् वेद ” ( अष्टाध्यायी 4 / 2 /58 ) इस सूत्र से अण् प्रत्यय होता है। इस सूत्र का अर्थ है – द्वितीया समर्थ प्रातिपदिक से अधीते = पढता है और वेद = जानता है इस अर्थ में यथाविहित प्रत्यय होता है अतः यहाँ अण् हुआ और “तद्धितेष्वचामादे:”
(अष्टाध्यायी 7 /2 /117 ) इस सूत्र से आदि अच् के स्थान में वृद्धि हो गयी। इस सूत्र का अर्थ है – तद्धित ञित् णित् के पर रहते अङ्ग के अवयय अचों के मध्य में आदि अच् के स्थान में वृद्धि होती है। इसके बाद “अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवायेSपि”( अष्टाध्यायी 8 /4 /2 ) इस सूत्र से न के स्थान पर ण हो गया। और ब्राह्मण शब्द सिद्ध हो गया। इसी प्रकार ” तस्यापत्यम् ” (अष्टाध्यायी 4 /1 /92 ) इस सूत्रसे भी अपत्य अर्थ में ब्राह्मण शब्द निष्पन्न होता है। आप कह सकते हैं कि – ” न मपूर्वोSपत्येSवर्म्मण:” (अष्टाध्यायी 6 /4 /170 ) इस सूत्र के अनुसार अप्त्यार्थक अण् के परे रहते वर्म्मन् शब्द के अन् को छोड़कर मकार पूर्ववाला अन् को प्रकृतिभाव नहीं होता है अतः “नस्तद्विते” ( अष्टाध्यायी 6 /4 /144 )सूत्र से टि भाग का लोप हो जाना चाहिए। क्यों नहीं हुआ ? सन्देश जी !इसका सन्देश सुनिये। ” ब्राह्मोSजातौ ”
(अष्टाध्यायी 6 /4/171) इस सूत्र से टि भाग का लोप नहीं हुआ। इस सूत्र में अजातौ शब्द पढ़ा हुआ है। यहां अजातौ में पर्युदास प्रतिषेध है। तथा इस सूत्र में महाभाष्यकार ने योग विभाग किया है। अतः अर्थ हुआ जाति से भिन्न अर्थ को कहने में ब्राह्म शब्द में टि लोप निपातन किया जाता है। और जाति अर्थ को कहने में अपत्य अर्थ में अण् के परे रहते ब्रह्मन् में टि भाग का लोप नहीं होगा अतः ब्राह्मण का अर्थ हुआ जो वेद को पढ़ता है, वेद को जनता है , ईश्वर को जनता है वह ब्राह्मण कहलाता है। यहाँ पाणीनि व्याकरणानुसार यह कहाँ सिद्ध हुआ कि ब्राह्मण जन्म से होता है। ब्राह्मण तो व्यक्तिवाचक शब्द है ब्राहमणत्व जातिवाचक शब्द है। लोक व्यवहार में जाति और व्यक्ति का अभेद सम्बन्ध होने के कारण व्यक्ति को भी जाति नाम से कह देता है। जैसे एक , दो तीन चार इत्यादि संख्येय है संख्या नहीं है संख्या तो एकत्व द्वित्व त्रित्व इत्यादि है।

इति आप सब के हितैषी = आचार्य वेदश्रमी वैयाकरण http://www.vedictemple.org/

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s