पारसियों की किताब अथर्ववेद का उल्टासीधा रूपांतरण मात्र है

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5 hrs · Edited ·

बुद्धिहीन पोंगे पंडित, धूर्त ईसा मसीह, अंगूठा छाप मोहम्मद!
शोधार्थी: फरहाना ताज

एक पोंगा कश्मीरी पंडित ब्रह्मदेव ने आज से हजारो साल पहले जरथु्रस्त्र को वेद पढाए थे। हमने एक पोस्ट में लिखा है कि पारसियों की किताब अथर्ववेद का उल्टासीधा रूपांतरण मात्र है, उसमें गायत्री मंत्र भी है।
बुद्धिहीन पोंगा पंडित ने ऋग्वेद में एक कथा बताई है कि इन्द्र ने सोम का पान किया और उसने वज्र से प्रथम सर्प (अहि) को मार डाला:
वृषायमाणोऽवृणीत
सोमं त्रिकद्रुकेष्वपिबत्सुतस्य।
आ सायकं मघवा अदत्त वज्रं
अहनदेनं प्रथमजा महीनाम्।।
सोम बुद्धि को उत्पन्न करने वाला ज्ञान वृक्ष था:
सोम पवते जनिता मतीनाम्
जिसे इंद्र अपने लिए सुरक्षित रखना चाहता था, लेकिन सर्प ऐसा नहीं होने की इच्छा रखता था:
यदिन्द्र अहत् प्रथम जायहीलाम्, आत् मायिनां अमिनाः प्रोतमायाः।
इसलिए इंद्र व सर्प का झगड़ा हुआ और इन्द्र ने मायावी तथा छली अहि को काट डाला। तत्पश्चात् बिना हाथ पैर वाला सर्प पृथ्वी पर आ सोया।
अहिः शयत उपपृक् पृथिव्याः।
अब जरथुस्त्र ने इसे अपनी भाषा में लिख मारा कि हेडेन नामक स्वर्ग में होम नामक वृक्ष था, उसी वृक्ष के फल को शैतान (अज्हि) ने प्रथम जोड़े (माश्य व माश्मान) को खिलाकर उन्हें कलुषित किया।
यही कथा धूर्त ईसा मसीह कश्मीर में सीखकर गए और बाइबिल में लिख मारी और बाइबिल से अंगूठाछाप मोहम्मद ने किसी के मुख से सुनकर कुरान में लिखने के लिए कह दिया। अंगूठाछाप मोहम्मद इसलिए हैं कि वे अनपढ थे, उनके गैंग में पहले 40 लोगों का समूह था, पांच के मरने पर पांच नए शामिल हुए, इसलिए इनकी संख्या 45 भी कही जाती है, परंतु अलीबाबा और 40 चोर की कहानी इन्हीं के जीवन पर कुछ कल्पना करके लिखी गई है। सयद हामिद मोहसिन, सलाम सेंटर बेंगलूर ने अपनी किताब में उन्हें अंगूठा छाप ही लिखा है उनकी वेबसाइट पर पढ सकते हैं। अब अंगूठा छाप आदमी क्या दुनिया को शिक्षा दे सकता है, वह भी धर्म की?
इसी कथा को बाइबल और कुरान में इस प्रकार कहा गया है: ईश्वर ने आदम को पैदा करके उसकी बायीं पसली से उसकी पत्नी हव्वा को बनाया। आदम को खुदा से स्वर्ग के बगीचे की देखभाल करने का निर्देश मिला। बगीचे में ज्ञान एवं अमरत्व नामक दो वृक्ष थे, जिनका फल खाने को खुदा ने आदम व हव्वा को मना किया था, क्योंकि परमात्मा को डर था कि वृक्षों का फल खाकर कहीं ये मेरी तरह ज्ञानी न हो जाएँ।
उसी बाग में परमात्मा का दुश्मन सर्प भी रहता था, उसने हव्वा को वर्जित वृक्षों का फल खाने को प्रेरित किया। इसी के तहत आदम व हव्वा को फल खाने के दंडस्वरूप जमीन पर परिश्रम करने के लिए आना पड़ा तथा साँप के हाथ-पैर काटकर उसे जमीन पर पेट के बल चलने का शाप दिया।
बेबिलोनिया में प्रचलित किंवदंती के अनुसार, स्वर्ग के प्राणी औरत व पुरुष ने सर्प के बहकाए में आकर ज्ञान फल खा लिया, फिर उन्हें ईश्वर के शाप के परिणामस्वरूप धरती पर आना पड़ा।
यूनानी मतानुसार, स्वर्ग (Elysium) में विद्यमान अमरत्व वृक्ष में स्वर्णिम फलों की रक्षा का दायित्व तीन देवियों व एक सांप पर था। महान शक्तिशाली हरक्यूलिस साँप के सिर को पैरों से कुचलकर फलों को प्राप्त कर लेता है। मिस्र में भी एक स्वर्गस्थ जीवन वृक्ष की सत्ता स्वीकार की जाती है, जिसके फल खाने से व्यक्ति ईश्वर तुल्य हो जाता है।
अब मेरा अर्थ सुनें: इंद्र का अर्थ सूर्य है, वृत्र का अर्थ बादल है और सोम जल का वाचक है। सोमरस यानी जीवनदाता जल को अहि यानी बादल अपने पास रखना चाहता है, लेकिन इंद्र अर्थात सूर्य बादल को अपनी रश्मिरूपी अस्थियों के वज्र से मारकर जमीन पर गिरा देता है, अर्थात बिना हाथ पैरो वाला बादल जमीन पर आ सोया यानी कि बरसात हो गई। इंद्र का सूर्य और अर्थ वृत्र करना मेरी कल्पना नहीं है, क्योंकि अथर्ववेद कहता है कि वृत्र यानी बादल के हटने से सूर्य उदय होता है
वृत्राज्जातो दिवाकरः
ये मूर्ख पोंगा पंडित दधीची के अस्थिदान की कथा सुनाते हैं पागल कहीं के। लेकिन मेरे पाक वेदो में दधीची का अर्थ सूर्य और उसकी अस्थियां रश्मियां हैं, इन किरणो से ही बाइबिल व कुरान की स्त्री यानी विद्युत उत्पन्न होती है और अहि यानी मेघ को छिन्न-भिन्न करती है।
इंद्रो दधीचो अस्थिभिर्वृत्राण्यप्रतिष्कृतः जघान ऋग्वेद 1.84.13

ब्रिटेन में 8000 प्राचीन भारतीय पांडुलिपि हैं, जिनकी फोटो स्टेट अमेरिका को खरबो डालरो में बेची गई।

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