पारसियों का जेंद अवेस्ता अथर्ववेद का परसियन में भाष्य मात्र है

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जेंद अवेस्ता यानी अथर्ववेद का रूपांतरण
क्या आप जानते हैं, पारसियों का जेंद अवेस्ता अथर्ववेद का परसियन में भाष्य मात्र है, जिसमें 80 प्रतिशत अथर्ववेद के मंत्र हैं और 20 प्रतिशत भाष्यकार ने अपने मन की मनगढंत बात लिखी है।
जेंद का गायत्री मंत्र: ओम भुर्वभुव सव ततसवितज वरेणम भर्गो देवस धमधि धियान धमज
ओर यज्ञ से यजिना और बाद में जेंद का यसना बन गया, जैसा एक मूल चित्र देखे।
अवेस्ता में लिखा है कि यह ज्ञान अहुर ने अंग्रेग को दिया और अथर्ववेद के बारे में मानते हैं कि अंगिरा को दिया।
और जेंद शब्द छंद का रूपांतरण और अवेस्था वेदो की व्यवस्था का रूपांतरण है।

और कुरान के एक अरबी विद्वान सेल महोदय कहते हैं मोहम्मद ने अपने विचार
पारसियों से लिए, लेकिन 20 प्रतिशत वे व्यर्थ के विचार भी लिए जैसे मशहर के
दिन सबका न्याय होगा और मुर्दे जी उठेंगे।
और कुरान में अथर्ववेद के
तीस प्रतिशत भाग का ज्यों का त्यों रूपांतरण है और ऋग्वेद के 60 मंत्र
कुरान में उसी अर्थ को दोहराते हैं, जैसा वेदो में।
और अजान वेदों से
ली गई, लेकिन वेद में हूबहू लिखा है वेदों की ओर आओ और कुरान में लिख दिया
सलात की ओर आओ। यदि शब्दों के मूल पर जाएं तो सलात का एक अर्थ वेद ही होता
है। जिसे नमाज भी कहा गया, लेकिन नमाज का अर्थ भी आहुति देने के समय झुकना
ही है, यानी श्रद्धा के साथ अल्लाह को समर्पित प्रार्थना।
वेद का
पर्यायवाची करण भी है और करण से कुरान बना ऐसा मैं नहीं सेल नामक अरबी
विद्वान ने लिखा, जिनकी पुस्तक के अंश मैं अगली पोस्ट में डाल दूंगी।

जब मैं बचपन में पढती थी, एक बार कुरान हाथ से छूट गई, तो बहुत डांट पडी,
बराबर नमक तोलकर गरीब को दिया गया। अम्मी ने बताया यह खुदा की किताब है,
नीचे नहीं गिरनी चाहिए, मैंने पूछा खुदा के पास इतनी बातें कहां से आई, तो
उन्होंने कहा कि खुदा के पास ज्ञान के चार बक्शे हैं, उनमें से खुदा ने दी।
और आज तीस साल बाद सोचती हूं, तो क्या ये चार बक्शे चार वेद नहीं हो सकते?

लेकिन कुरान में बहुत सी बातें अतार्किक भी हैं, तो पवित्र वेदो के
मंत्रों में इसी प्रकार मिला दी गई, जैसे दूध में पानी, लेकिन पानी मिलाते
हुए दूधवाले यह नही सोचते कि पानी कहां से मिलाया। मैं एक बार सास के घर
गई, दूधिया दूध लेने आया तो उसने दूध लेने के बाद पशुओ को पिलाया जाने वाला
पानी ही दूध में मिला दिया था, जो झूठा और गंदा था। मनुष्य के पीने योग्य
नहीं था। लेकिन उसे तो व्यापार करना था। परंतु धर्म का व्यापार नहीं किया
जा सकता, लेकिन क्या करें पोंगा पंडित और कट्टरपंथी मुस्लिम धर्म के
ठेकेदार और व्यापारी ही तो हैं, सत्य का निर्णय करने के बारे में कोई नहीं
सोचा।

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