देश के हत्यारे और वेदो के शत्रुओ की ढोल की पोल

Farhana Taj
देश के हत्यारे और वेदो के शत्रुओ की ढोल की पोल

फरहाना ताज

कोई जमाना था भारत का यवन भी वैदिक संस्कृति अपनाने के लिए तड़प रहा था। इकबाल ने अपनी इस तड़प को अपने ग्रंथ बांगेन्दरा में इस प्रकार व्यक्त किया:
1. मैं असल का सोमनाती।
आबा मेरे लाती व सोमनाती
मरा बनकर की दर हिन्दुस्तान दीगर न में बीनी।
ब्राह्मण जादाय दम्जाश्नाय राम तबरेज असत
2. सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा।
हिन्दी हैं हम वतन हैं हिन्दोस्ताँ हमारा
3. आ गैरियत के पर्दे इक बार फिर उठा दें।
बिछुड़ों को फिर मिला दें, नक्शे दुई मिटा दें
सूनी पड़ी हुई है, मुद्दत से दिल की बस्ती।
आ इक नया शिवाला इस देश में बसा दें
दुनिया के तीरथों से उंचा हो अपना तीरथ।
दामाने आसमां से उसका कलश मिला दे
हर सुबह उठकर गायं वेद मंत्र मीठे-मीठे।
सारे पुजारियों को मय प्रीत की पिला देें
शक्ति भी, शांति भी भक्तों के गीत में है।
भारत के वासियों की शक्ति प्रीत में है
इतना ही नहीं आजादी से पूर्व स्कूल की प्रार्थना इकबाल के इस गीत से हुआ करती थी:
लब पे आई है दुआ बनके तमन्ना मेरी।
जिंदगी शमा की सूरत हो खुदाया मेरी
इकबाल पर अद्वैत का भी कितना रंग चढ़ा था
ढूँढता फिरता हूँ मैं, इकबाल अपने आपको।
आप ही गोया मुसाफिर आप ही मंजिल हूँ मैं
इससे भी आगे एक स्थान पर इकबाल ने लिखा है, ‘सभी मुसलमानों के शरीर में खून तो भारतीय ऋषियों का ही है। आज तक इस देश की किसी भी मस्जिद में एक भी ऐसा ब्लड पम्प नहीं लगा जो किसी मुस्लिम के शरीर से पुराना खून निकालकर नया अरबी खून उसके शरीर में उढ़ेल सके।’
और वे हिन्दू बनना चाहते थे तो नेहरूजी ने स्पष्ट कह दिया कि मुसलमान हिन्दू नहीं बन सकता और यदि कोई संगठन शुद्धि आंदोलन चला रहा है, तो वह धर्म के विरुद्ध है। इससे तो आजादी खतरे में पड जाएगी।
इसका उत्तर इकबाल ने निम्न शब्दों में दिया:
सच कहूं अय नेहरू गरतु बुरा न माने।
तेरे सनम कदों के बुत हो गए पुराने
अपनों से बैर रखना तूने बूतों से सीखा।
जंगों अदल सिखाया वाइज को भी खुदा ने
तंग आके मैंने आखिर दैरो-हरम को छोड़ा।
वायज का वाज छोड़ा छोड़े तेरे फिसाने
पत्थर की मूर्ति में समझा है तू खुदा है।
खाके वतन का मुझको हर जर्रा देवता है
इतना ही नहीं इससे आगे बढ़कर इकबाल साहब ने अलग मुस्लिम राष्ट्र की माँग उठाई और यह कहा
चीनो अरब हमारा हिन्दुस्तां हमारा।
मुस्लिम हैं, हम वतन है सारा जहां हमारा
तेगों के साये में हम पल कर जवां हुए हैं।
सौ बार ले चुका है तू इम्तहां हमारा
सर मुहम्मद इकबाल के दादा सहज सप्रू हिंदू कश्मीरी पंडित थे, इकबाल भी हिन्दू बनना चाहते थे, लेकिन कांग्रेसियों ने नहीं बनने दिया। इतना ही नहीं मेवात में स्वामी श्रद्धानंद के शुद्धिकरण के आंदोलन के विरोध में सरकारी संत विनोबा भावे ने गांधी के कहने पर भूख हडताल तक की और शुद्धिकृत लोगों का पुनः गौभक्षक बनाकर ही दम लिया।
कांग्रेस से खफा भारत के विभाजन और पाकिस्तान की स्थापना का विचार सबसे पहले इकबाल ने ही उठाया था। 1930 में इन्हीं के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने सबसे पहले भारत के विभाजन की माँग उठाई। इसके बाद इन्होंने जिन्ना को भी मुस्लिम लीग में शामिल होने के लिए प्रेरित किया और उनके साथ पाकिस्तान की स्थापना के लिए काम किया। दोस्तो यही सच्चा इतिहास है।

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