Mulla Naseeruddin and his lies [about selfish prayers in vedas]-III

वेदों की स्वार्थी प्रार्थनाएं

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keekat mushafiq

किं ते कर्ण्वन्ति कीकटेषु गावह नाशिरं दुह्रे न तपन्तिघर्मम |
आ नो भर परमगन्दस्य वेदोनैचाशाखं मघवन्रन्धया नः ||

हे इन्द्र, अनार्य देशों के कीकट वासियों की गौओं का तुम्हे क्या लाभ है? उनका दूध सोम में मिला कर तुम पी नहीं सकते। उन गौओं को यहाँ लाओ। परमगन्द (उनके राजा), की संपत्ति हमारे पास आजाए। नीच वंश वालों का धन हमें दो।

[ऋग्वेद 3/53/14]

यह अनार्यों के धन और संपत्ति को लूटने की कैसी प्राथना वेदों में की गई है?

‘कीकट’ शब्द की व्याख्या करते हुए यास्क आचार्य ने ‘निरुक्त’ में लिखा है,
कीकटा नाम देशो अनार्यनिवासः
[निरुक्त 6/32]

अर्थात कीकट वह देश है जहां अनार्यों का निवास है। इस पर टिप्पणी करते हुए प्रसिद्ध आर्यसमाजी विद्वान पं. राजाराम शास्त्री ने लिखा है- “कीकट अनार्य जाती थी, जो बिहार में कभी रहती थी, जिस के नाम पर बिहार का नाम कीकट है.”(निरुक्त, पृ। 321,1914 ई.)।

स्वामी दयानंद ने ‘कीकटाः’ का अर्थ करते हुए लिखा है-

“अनार्य के देश में रहने वाले मलेच्छ ”
तो जी अब आप ही फेसला कीजिए कि यह दूसरों का धन लूटने की स्वार्थी प्रार्थना है या नहीं। मैंने केवल एक उदाहरण दिया अन्यथा ऐसी स्वार्थी प्रार्थनाओं के अतिरिक्त वेदों में कुछ और है भी नहीं।

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another version is

http://106.10.137.112/search/srpcache?ei=UTF-8&p=islam+hinduism+initiative+%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%A6%E0%A5%8B%E0%A4%82+%E0%A4%95%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A5%80+%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%82&vm=r&rd=r1&fr=crmas&u=http://cc.bingj.com/cache.aspx?q=islam+hinduism+initiative+%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%A6%E0%A5%8B%E0%A4%82+%E0%A4%95%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A5%80+%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%82&d=4522936757587273&mkt=en-IN&setlang=en-IN&w=K2t8RyuLvzYIyzjLksau5tpdURrJjm8K&icp=1&.intl=in&sig=Dllw1BFxc1lljYujV55UwQ–

किं ते कर्ण्वन्ति कीकटेषु गावह नाशिरं दुह्रे न तपन्तिघर्मम |
आ नो भर परमगन्दस्य वेदो नैचाशाखं मघवन्रन्धया नः ||

हे इन्द्र, अनार्य देशों के कीकट वासियों की गौओं का तुम्हे क्या लाभ है? उनका दूध सोम में मिला कर तुम पी नहीं सकते। उन गौओं को यहाँ लाओ। परमगन्द (उनके राजा), की संपत्ति हमारे पास आजाए। नीच वंश वालों का धन हमें दो। [ऋग्वेद 3/53/14]

पंडित जी, यह अनार्यों के धन और संपत्ति को लूटने की कैसी प्राथना वेदों में की गई है?

‘कीकट’ शब्द की व्याख्या करते हुए यास्क आचार्य ने ‘निरुक्त‘ में लिखा है,

कीकटा नाम देशो अनार्यनिवासः [निरुक्त 6/32]

अर्थात कीकट वह देश है जहां अनार्यों का निवास है। इस पर टिप्पणी करते हुए प्रसिद्ध आर्यसमाजी विद्वान पं. राजाराम शास्त्री ने लिखा है- “कीकट अनार्य जाती थी, जो बिहार में कभी रहती थी, जिस के नाम पर बिहार का नाम कीकट है.” (निरुक्त, पृ। 321, 1914 ई.)

स्वामी दयानंद ने ‘कीकटाः’ का अर्थ करते हुए लिखा है-

“अनार्य के देश में रहने वाले मलेच्छ ”

तो पंडित जी अब आप ही फेसला कीजिए कि यह दूसरों का धन लूटने की स्वार्थी प्रार्थना है या नहीं।  मैंने केवल एक उदाहरण दिया अन्यथा ऐसी स्वार्थीप्रार्थनाओं के अतिरिक्त वेदों में कुछ और है भी नहीं।

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आर्य सिद्धान्ती :

मुल्ला नसीरुद्दीन ने जो ऋग्वेद का ३/५३/१४  मंत्र लिखा है उसका सही अर्थ { ऋग्वेद भाग २ सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा नयी दिल्ली ११०००२ पृष्ठ ४४५-४४६ } इस प्रकार है:
हे विद्वान ! आपके अनार्य देशों में बसने वालों में, गांवों से नहीं, दुग्ध आदि को दुहते हैं, दिन को नहीं तपाते  हैं , वे क्या करेंगे वा क्या करते , और आप हम लोगों के लिए जो कुलीन मुझको प्राप्त होता है, उसके धन को सब प्रकार से धारण करिए और हे श्रेष्ठ धन से युक्त ! आप हम लोगों के  नीची शक्ति जिसमें , उसकी निवृत्ति करो।

भावार्थ : इस मंत्र में उपमा अलंकर है।  जैसे म्लेच्छ  जनों में गौओं  की , नास्तिक पुरुषों में धर्म आदि गुणों की वृद्धि नहीं होती , और वैसे ही विद्वानों में ईश्वर को नहीं मानने वाले  प्रबल न होवें  इसलिए चाहिए की मनुष्यों में नास्तिकत्व को सर्वथा वारण  करे।

आइये { निरुक्त शास्त्रं – पंडित  भग्वद दत्त – रामलाल कपूर ट्रस्ट -६/३२ -पृष्ठ ३७९ }  में देखें क्या लिखा है :

भाष्य : गोदुग्ध और गोघृत यज्ञ के श्रेष्ठ साधन हैं। जब उन साधनों से यज्ञ नहीं होते, तो मानव जीवन निष्फल है। उन यज्ञ हीन देशों वाले , अनार्य लोग गौओं से लाभ नहीं उठाते। ते = तेरी गौएँ , मघवा अथवा इंद्र की गौएँ। ये रश्मि रुपी गौएँ अंतरिक्ष में हैं। उन्हीं की उपमा से पार्थिव गौओं से पूर्ण लाभ उठाने का तथ्य इस ऋक में है। कीकट देश मूलार्थ में पृथ्वी पर का नहीं है। प्रमगंद = अत्यंत कुसीदी की बहुत निंदा है। जो लोग अपने वंश को धर्म, ज्ञान और सुकृत कर्मों से उन्नत नहीं करते, उनकी भी निंदा है। उन का धन रजा को लेकर श्रेष्ठ कामों में लगवाना चाहिए देखें महाभारत शांति पर्व १९६/१०

अदात्रिभ्यो हरेद वित्तं विख्याप्य नृपति: सदा।

यज्ञ कर्मों  में धन न देने वालों का वित्त राजा हर ले।  

आज भी बुद्धिमान एवं नीति निपुण  सरकार जमाखोर कंजूसों के साथ ऐसा ही करती है।

-आक्षेप निराधार साबित हुआ

-तुम्हारा झूठ फिर पकड़ा गया

नमस्ते

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