क्या ऋग्वेद में से ५००,४९९ मन्त्र लुप्त हो गए हैं? [संक्षिप्त ]

पूर्वपक्ष

ऋग्वेद के 999 सूक्त लुप्त;

शौनक के ब्रहद्देवता, कात्यायन की सर्वानुक्रमणि, तथा सायण और स्कन्द स्वामी के ऋग्वेद मण्डल 1 सूक्त 99 के भाष्य की उत्थानिका में लिखा है कि कश्यप ऋषिदृष्ट 1000 सूक्त थे, उन में क्रम से एक-एक मंत्र बढ़ता जाता है। १.अनुक्रमणीकार कात्यायन :सूक्त 99 पर अनुक्रमणीकार कात्यायन ने लिखा है कि जातवेदस एका । जातवेदस्यम् एतदादीन्येकभूयांसि सूक्तसहस्त्रमेतत्कश्यपार्षम् ।

अर्थात, जातवेदस इत्यादि 1000 सूक्त कश्यप ऋषिदृष्ट हैं।

२.शोनक ऋषि का ब्रहद्देवता:

B जातवेदस्यं सूक्तसहस्रमेकम् ऐन्द्रात्पूर्वं कश्यपार्षं वदन्ति।

B जातवेदसे सूक्तमाद्यं तु तेषाम् एकभूयस्त्वं मन्यते शाकपूणिः॥130

एक हज़ार जातवेदस को संबोधित सूक्त जो इंद्रा को संबोधित सूक्त (ऋग्वेद मण्डल 1 सूक्त 100 ) से पहले आते हैं कश्यपऋषिदृष्ट हैं। इन सूक्तो का पहला सूक्त है “जातवेदस के लिए …(जातवेदसे सुनवाम ……..ऋग्वेद मण्डल 1 सूक्त 99 )। शकुपानी के अनुसार उनमे क्रम से एक-एक मंत्र बढ़ता जाता हे। (ब्रहद्देवता 3 -130 -B)

३.षड्गुरुशिष्य की वेदार्थदीपिका : षड्गुरुशिष्य के लेखानुसार ये ऋचाएं संख्या में 5,00,499 थीं ऋचस्तु पंचलक्षा स्युः सैकोनशतपंचकम् इन सब तथ्यों से ये प्रमुख बिन्दु हमारे सामने आते हैं: 1.ऋग्वेद मण्डल 1 सूक्त 99 जातवेदस सूक्त कश्यप ऋषिदृष्ट है। 2.ऋग्वेद मण्डल 1 सूक्त 99 को मिलाकर कुल 1000 जातवेदस सूक्त कश्यप ऋषिदृष्ट हैं। 3.ऋग्वेद मण्डल 1 सूक्त 99 इन 1000 सूक्तो में प्रथम सूक्त है। 4.कश्यप ऋषिदृष्ट ये 1000 सूक्त ऋग्वेद मण्डल 1 सूक्त 100 से पहले आते है। 5.इन सूक्तों में  क्रम से एक-एक मंत्र बढ़ता जाता हे, जिसका निस्कर्ष ये हुआ कि इन 1000 सूक्तों में कुल ऋचाओं की संख्या 500,500 हुई। 6.वर्तमान ऋग्वेद संहिता में कश्यप ऋषिदृष्ट इन 1000 सूक्तो में से केवल एक सूक्त मिलता है, जिसका निस्कर्ष ये हुआ कि 999 सूक्त लुप्त हो गए हैं या हम ये भी कह सकते है कि 5,00,499 ऋचाएं लुप्त हो गयी हैं। ..श्रीमानजी मुलल‌ा दो पयाजा  साहिब …………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………. उत्तरपक्ष यह प्रश्न, पहले कहें तो, नया नहीं है। पं. भगवद्दत्त, पं. जयदेवशर्मा आदि वैदिक विद्वानों के सामने भी यह प्रश्न उपस्थित था, इसका उत्तर भी।  शंका का मौलिक स्वरूप पंडिताग्रणी श्री. भगवद्दत्त जी के वाक्यों में – शौनकीय बृहद्देवता ३.१३० और कात्यायनीय ऋक् सर्वानुक्रमणी में ऋग्वेद १.९९ पर लिखा है कि कई पुराने आचार्यों का मत है कि ऋ. १.९९ से आरम्भ होकर एक सहस्र सूक्त थे। उन का देवता जातवेद और ऋषि कश्यप था। महर्षि शाकपूणि के नाम से इस बात की पुष्टि करनेवाला एक वचन भी प्रचलित है कि प्रथम सूक्त (=ऋ. १.९९) में एक मन्त्र था, और प्रत्येक अगले सूक्त में एक एक मन्त्र बढ़ता जाता था। अर्थात् वर्तमान संहिता में अनुपलब्ध उन ९९९ सूक्तों में ५००, ४९९ मन्त्र थे। अब प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या ये मन्त्रगण कभी ऋग्वेद का अङ्ग थे? षड्गुरुशिष्य  की सर्वानुक्रमणीवृत्तिः खिलसूकतानि चैतानि तवादयैकरचमधीमहे । शौनकेन सवयं चोकतमऋषयणुकरमणे तविदम॥ पूर्वात्पूर्वा  सहसतरसय सूकतानामभूयसाम। जातवेदस इतयादयम कशयपारषसय शुश्रुम॥ इति सयोवऋषीयांता वेदमधयासतवखिलसूकतगा्:। ऋचस्तु पंचलक्षा: स्युः सैकोनशतपंचकम् पाठक देखिए वृत्ति का मूलपाठ पूर्ण रूप में। और उसका अन्तिम वाक्य तथा नीचे दिये श्रीमानजी मुलल‌ा दो पयाजा  साहिब  के वाक्य की भी तुलना कीजिए। –   ऋचस्तु पंचलक्षा स्युः सैकोनशतपंचकम् एक विसर्ग का लोप के अतिरिक्त कोई भेद नहीं। मतलब है वृत्ति का मूल पाठ श्रीमानजी मुलल‌ा दो पयाजा  साहिब ने देखा ही होगा। फ़िर पूर्ण रूप क्यों नहीं दिया? क्योंकि वृत्तिकार मात्र संख्या न देकर इस प्रश्न का उत्तर भी दे रहे हैं, जोकि मुलल‌ा  साहिब की वीरतापूर्ण विद्वत्तता का चन्द्रहास को उड़ा ही दें। चित्र में दिया पाठ में कात्यायनीय सर्वानुक्रमणी के वृत्तिकार श्री.षड्गुरुशिष्य ने शौनकीय आर्षानुक्रमणी का प्रस्ताव उद्धृत किया हैं। मूलपाठ का अर्थ अब देखें – ये (९९९) सब खिल सूक्त हैं। उनकी आदि की एक ऋचा ही एक ऋचावाला सूक्त है। उसका हम शौनक(माण्डूकेय-बह्वृच शाखावाले) अध्ययन करते हैं। शौनक ने स्वयं ऋष्यनुक्रमणी में कहा है – (॰पूर्वात्पूर्वा….शुश्रुम॰) अर्थात्, एक एक बढनेवाले सहस्रसूक्तों में से पूर्व सूक्त से पूर्व (आदि) सूक्त की ऋचा यह काश्यप ऋषि दृष्ट जातवेदसे सुनवाम…है, ऐसी श्रुति है।‘अखिल’ (ईश्वरसृष्ट) सूक्तों (१.९९ और १.१००) के बीच में एक कम पांचलाख पांचसौ (५००४९९) ये खिल ऋचाएँ पढ़ते हैं।

खिल क्या होता है? – परशाखीयं स्वशाखायामपेक्षावशात्पठ्यते तत्खिलमुच्यते। (महा.भा. शां. ३२३.१०, नीलकण्ठीयम्।) – अर्थात् – मूलसंहिता में अविद्यमान होने से कोई एक शाखा में किसी अपेक्षावशात् अन्यशाखाओं से लेकर पाठ किया जाता है वह खिल होता है। यहां तो काश्यपशाखा से लिया हुआ होगा। काश्यपशाखा की विद्यमानता में काशिकावृत्ति ४.३.१०३ प्रमाण है। वहां लिखा है – काश्यपेन प्रोक्तं कल्पमधीते काश्यपिनः। ।विश्वामित्रो जमदग्निर्भरद्वाजो अथ गौतमः। अत्रिर्वसिष्ठः कश्यप इत्येते सप्त ऋषयः। – ऐसा आश्वलायनश्रौतं प्रवरः परिशिष्ट में पठित होने से भी काश्यपकुलपरम्परा का अस्तित्व सिद्ध है। इससे ये सिदध हो गया कि ये ऋचाएं अखिल नहीं हैं । इसलिेए ये ‌‌वेदांग नहीं है। शंक‌ा निराधार है॥
…………………………………………………………………………………………Acharya Anndraj
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3 thoughts on “क्या ऋग्वेद में से ५००,४९९ मन्त्र लुप्त हो गए हैं? [संक्षिप्त ]

  1. Thank You Acharya AnndRaj & Yash Aryaji, I have to give credits to you guys that you still afford to give rebuttals to Mushfiq Mujahideen & his team as they are not producing any scholarly level arguments and they have not studied Vedas as per Vedic wisdom. I wander you even give “rebuttals” to this jihadi articles, Anyway good work carry on sir! This Mohammedeans have got habit to interprete the other religious texts as per thir interest, they will translate verse which looks like prophecy of Muhammad in Bible or in Vedas etc. While they will translate other verses as per their Taqiyah propoganda to attack. Namaste.

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